Tuesday, 24 December 2013

हद कर दी 'आप' ने

शतरंज में अगर कोइ अपनी मोहरों के बारे में पहले ही बता दे कि भई मैं प्यादे को इस तरह सरका कर, अपना घोड़ा यहाँ रखूंगा, ऊँट इधर होगा और वजीर इस बॉक्स में रखकर शह दूंगा / अब भला आप बताइये कोइ कभी जीत सकता है ? उसे न केवल हारना है बल्कि वो महामूर्ख भी कहलायेगा/ आप पारदर्शी रहें मगर इतने कि अपने पत्ते खोल कर सामने रख दें , एक खिलाड़ी के लिए यह बेवकूफाना प्रदर्शन होता है और अरविन्द केजरीवाल यही सब कर रहे हैं/
ईमानदारी का ढोल पीट कर अपने माई-बाप जनता की इज्जत और उसके विशवास के साथ घात करना 'आप' का शगल हो चला है/ बड़ी शान से कहा जाता है कि हमारी माई-बाप जनता है उससे अगर हम राय मांगते हैं तो क्या गलत करते हैं/ आप अब तक के आम आदमी वाले सफ़र को देख लीजिये उसने जनता से मांगने के अलावा दिया क्या है? ख़ैर  ..  / छोटा सा उदाहरण है -आपके माता-पिता ने आपको पढ़ा लिखा कर बड़ा किया, कलेक्टर तक बना दिया अब आप अपने क्षेत्र में होने वाली प्रत्येक समस्या-कार्य इत्यादि को लेकर कहें कि नहीं पहले मैं अपने माता-पिता से पूछूंगा तभी कोइ काम करूंगा , कैसे सम्भव है ? पिता आपके काम के बारे में क्या जानता है बेचारा ? उसे तो आपको कलेक्टर बनाना था, अब आपकी काबिलियत है कि आप कैसे घर चलाते हैं/ अपने माता-पिता को किस प्रकार रखते हैं/ आप असफल होते हैं और इसका दोष  भी बेचारे माता-पिता के सिर  फोड़ते हैं कि उन्होंने हमारा पूरा पूरा साथ नहीं दिया अन्यथा बेहतरीन तरीके से घर चला लेता / यह दोगला चरित्र है/ यह किसी भी आदमी के लिए पतन का मार्ग है/ यह धोखा है / और यह सबकुछ इन दिनों 'आम आदमी पार्टी' द्वारा किया जा रहा है/ बार बार खुद को साफ़ स्वच्छ बताकर जनता को सिर्फ बरगलाया ही जा रहा है/ आप आखिर जनता को दे क्या रहे हैं?
नई प्रकार की राजनीति  का डिब्बा बजाते फिर रहे हैं मगर भूल रहे हैं इसमें जनता का कितना नुक्सान हो रहा है/ सत्ता के मोह और उससे अलग रहकर जनता का काम करना ही था तो समाज सेवा ही करते रहते/ देश में कितने लोग हैं जो समाज सेवा में लीं है और बगैर किसी स्वार्थ के/ राजनीति का मैदान खिलाड़ियों का मैदान होता है/ खिलाड़ी को जीतना होता है और वो उसी तरह की रणनीति बनाता है/ आपने भी रणनीति बनाई मगर दर्शकों के कंधे पर रख कर बन्दूक से निशाना साधने की जो बचकानी जिद है यह ले डूबने वाली है/ देखिये बिन्नी जैसे नेता ने अपना मोह प्रकट कर दिया / और यह मोह बेकार भी कहाँ हैं/ ईमानदार मोह है/ आपने गलत किया  कि एक सधे और अनुभवशाली नेता को हाशिये पर रखने का दुस्साहस किया / नतीजा सामने है/ मोह सबको है/ अरविन्द केजरीवाल को भी मोह है/ उनका मोह इस तरह का है कि वे जनता के सामने पाक-साफ़ दिखाई देते रहें/ इसके लिए ve राजनीति कर रहे हैं/ उन्हें जनता के लिए कुछ करना है , ऐसा अबतक नहीं दिखा / बात मेंडेट की कहते हैं/ २८ सीट मिली/ बहुमत नहीं मिला/ आपको बहुमत से क्या करना है/ सरकार बनाकर जनता की भलाई में लगना है / कीजिये/ जब कोइ टांग अड़ाता वो जनता को  सामने दिखाई  ही देता / इसमें परेशानी क्या थी? बहरहाल, आपमें कूवत नहीं है/ वो सिर्फ बेवकूफ बनाना जानती है/ या फिर उसे इसीमें मज़ा आता है या फिर अचानक मिली गद्दी ने उनका दिमाग अस्त व्यस्त कर दिया है/
अपने विरोधियों को मात देने का मतलब यह नहीं कि खेल से भागने की नीति अपनाना / उन्हें सावधान कर देना/ आप सरकार बनाकर वह सब कर सकते थे जिसके लिए नाटक रचा और जनता को बार बार भौंचक बनाये रखा है/ फिलहाल बिन्नी महाशय को मना लिया गया है और हर बार की तरह मीडिया को कटघरे में खड़ा करते हुए 'आप' ने शपथ ग्रहण की और कदम बढ़ा लिया है/ संकट बरकरार है/ अगर कांग्रेस अपना समर्थन वापस लेती है तो यह कांग्रेस का दोष नहीं माना जाएगा बल्कि 'आप' दोषी होगी/ 'आप' ही एकमात्र जनता के कलप्रिट है जिसने सरकार बनाने में डेरी की फिर इतनी आग उगली कि उसके समर्थन वाली पार्टी को बिदकना पड़ा/ आखिर कौन अपमान का घूँट पी पी कर समर्थन देगा? 'आप' इतनी ही ईमानदार है तो अबके फिर चुनाव हो ही जाए/ दूध का दूध पानी का पानी जनता सामने ले आयेगी / क्योंकि जनता को 'आप' जैसी पार्टी से मोहभंग हो चला है/ प्रत्यक्ष को प्रमाण क्या वाले कथन के साथ जनता यह जान चुकी है कि 'आप' में सिर्फ चिल्ला चोट करने का हुनर है , सरकार बनाकर जनता की भलाई करने का नहीं/ 

Friday, 13 December 2013

अन्ना का अनशन रिटायर होती कांग्रेस को पेंशन

अगर आपको कहें कि अन्ना का अनशन रिटायर होती कांग्रेस को पेंशन और लोकपाल की आड़ में झोलझाल करना है तो कैसा लगेगा? अच्छा नहीं लगेगा न / मगर इस अनशन से उभरी तस्वीर संदेह को मजबूत भी तो करती है कि अन्ना का अनशन अब लोकहित में कम कांग्रेस हित में ज्यादा दिखता है /
पिछले दिनों अन्ना के  मंच से कांग्रेस द्वारा  पेश किये गए बिल के समर्थन में जो बात कही गयी वो संदेह को पुख्ता करने के लिए पर्याप्त है कि अन्ना को यह क्या हो गया ? अन्ना के अचानक कांग्रेसी करण को देखकर भौंचक रह जाने के आलावा दूसरा कुछ दिखता क्यों नहीं ? संसद में रखे गए लोकपाल और अन्ना के जनलोकपाल में काफी अंतर होने के बावजूद उसे स्वीकार कर लेने की मंशा क्या कांग्रेस को जीवनदान देने जैसा नहीं है? कांग्रेस द्वारा पेश किये जाने वाले बिल में अन्ना के जनलोकपाल बिल के कई मुद्दे नहीं है/ सरकारी बिल के अनुसार न तो सीबीआई को लोकपाल के दायरे में लाया जा रहा है, न सिटिजन चार्टर लागू किया जा रहा है और ना लोअर ब्यूरोक्रेसी को लोकपाल की जांच के दायरे में रखा जा रहा है/ जबकि इन मांगों को लेकर ही अन्ना बनाम सरकार जैसी स्थितियां निर्मित हुई थी/ 'आप' को सरकारी लोकपाल मंजूर नहीं है/ जबकि अन्ना सरकारी लोकपाल के पक्ष में खड़े होते दिखने लगे हैं/ यदि ऐसा ही था तो अन्ना द्वारा देश की जनता को इतने दिनों तक आंदोलन की आग में झौंकने  का क्या औचित्य था? क्या अन्ना इस तरह देश की जनता के साथ धोखा नहीं कर रहे? या फिर वे कांग्रेस के समर्थन में उतर आये हैं?
अब आप अन्ना और अरविन्द केजरीवाल की राजनीति को समझिये/ दोनों ने एकसाथ मिलकर आंदोलन शुरू किया था/ कांग्रेस के खिलाफ आग उगली थी/ बाद के दिनों में अरविन्द केजरीवाल ने अपनी आम आदमी पार्टी ' बना ली और अन्ना से दूरी भी/ किन्तु यह दूरी दिखावे की दूरी ज्यादा प्रतीत हुई/ आपसी मतभेद के बावजूद दोनों ही कांग्रेस के प्रति झुके  हुए  नजर आते हैं/ दिल्ली की  सत्ता के लिए 'आप' और कांग्रेस के बीच के समीकरण छुपाय  नहीं छुपते  / अन्ना द्वारा सरकारी लोकपाल के समर्थन में खड़े हो जाना कांग्रेस की डूबती नैया को पार करा देने जैसा है/ कांग्रेस को यही सब तो चाहिए / आज उसकी हालत जिस तरह से गिरती जा रही है उसे अन्ना और 'आप' के सपोर्ट की बहुत आवश्यकता है, भले ही छुपे तौर पर/ और यह उसे मिलता भी नज़र आता है/
अब आप अन्ना की कही गयी बातों को देखें और खुद समझने का प्रयास करें - ‘कोई बात नहीं... सोमवार को उस पर बहस होने दो। एक दिन लोकसभा के लिए रख लो। मुझे पूरा भरोसा है कि इस बार बिल पास हो जाएगा।’ यानी अन्ना इसी सरकारी बिल पर मानने को तैयार हैं/ उनकी करीबी किरण बेदी ने तो खुले तौर पर इस बिल को ‘अन्ना का जनलोकपाल’ बता दिया है/ क्या देश की आँखों में धूल नहीं झौंकी जा रही ? जनता जो इस आंदोलन में अपना सबकुछ न्योच्छावर कर कूदी थी क्या सरकारी बिल को पाकर वो संतुष्ट  होगी ? अन्ना और अरविन्द ने अपने अपने हित तो साध लिए , और आज भी जनता के कन्धों पर बन्दूक रख कर साध रहे हैं किन्तु जनता को क्या मिल रहा है ? सोचिये /

Wednesday, 11 December 2013

मिस्टर ईमानदार का पासा

अन्ना के दम पर नेता बने मिस्टर ईमानदार अरविन्द केजरीवाल बीमार हो गए हैं/ और शायद तब तक बीमार रहेंगे जब तक के अन्ना का अनशन ख़त्म न हो जाए/ तरह तरह की बातें इसलिए हो रही है कि अभी जीत के जश्न में कह तो दिया कि वे अन्ना से मिलने रालेगढ़ जायेंगे मगर अचानक दूसरे दिन सुबह बीमार हो गए/ उनके टीम सदस्य अब अन्ना के अनशन में शरीक होंगे/
अच्छा यह बताएं कि आखिर अन्ना के अनशन में मिस्टर ईमानदार क्यों जाना चाहते थे? इसलिए कि  अन्ना से जुड़े रहें हैं और उनसे विलगता की खबर उनकी राजनीति के लिए तकलीफदेय साबित हो सकती है / वे चाह कर भी अन्ना का 'नाम' अपने मुंह से अलग नहीं कर सकते क्योंकि यही वह मंत्रित नाम है जिसके जाप ने उन्हें नेता बना कर खड़ा कर दिया है/ दूसरी ओर  अन्ना के अनशन में जाकर वे मैसेज क्या देना चाहते थे ? इमानदराना तरीके से जनता को बेवकूफ बनाना अरविन्द बेहतर जान चुके हैं/ उनके मैसेज में अन्ना एक बार फिर आवरण होते और वे अपनी राजनीति आसानी से धका लेते/ फिलवक्त वे कर भी यही रहे हैं / और शायद अन्ना खेमे में उनकी चालबाजियां समझ आने लगी है और सम्भव है इसी वजह से अन्ना खेमे ने अरविन्द को अपने अनशन से दूर रखना चाहा हो और अरविन्द ने अपनी प्रतिष्ठा बचाने के लिए बीमारी का बहाना बनाया हो और अपने सदस्यों को अन्ना के पास भेजा हो? उधर अन्ना के साथ तकलीफ यह है कि वो भी अरविन्द  को सीरे से नकार नहीं सकते/ इसमें अन्ना की मजबूरी है/ मगर अन्ना टीम में अरविन्द के लिए अब पहले जैसी कोइ जगह नहीं बची है/ अन्ना टीम अच्छी तरह से जानती है कि अरविन्द केजरीवाल किस चिड़िया का नाम है जो चुगती  तो अन्ना के यहाँ है और दम देशभर में ईमानदारी का भरती  है /अगर अरविन्द अन्ना के लिए इतने ही वफादार होते, ईमानदार होते तो वे बीमारी के बावजूद रालेगढ़ जा सकते थे/ जब वे अपना चुनाव प्रचार बीमारी में कर सकते हैं, अनशन के नाम पर कभी बीमार हो सकते है , अपना लक्ष्य नहीं छोड़ते तो अन्ना के पास जाने में ऐसी कौनसी बीमारी उन्हें रोक दे रही है? भई , बातें तो तरह तरह की होंगी, सवाल तो उठेंगे क्योंकि अरविन्द राजनीति के उस्ताद माने जाने वाले खिलाड़ी माने जाने  लगे हैं/ वे पब्लिक फिगर हैं और उनकी प्रत्येक गतिविधि पर सबकी नजरें होंगी /
बहरहाल, दम्भ आदमी के पतन की ओर इशारा करता है/ अपनी रोतली स्टाइल से बोल कर वे जनता के दिमाग को कब तक ठग सकते हैं यह देखना है/ खुद ईमानदार होने का सर्टिफिकेट दिखाया करते हैं , जब जनता ने उन्हें मौका दिया तो लालच देखिये उन्हें बहुमत देकर दिखाओ फिर काम करेंगे ,वाली मानसिकता बना ली है/ और तो और अपना गुस्सा वे भाजपा पर उढ़ेल रहे हैं कि अगर उनके यहाँ कोइ ईमानदार नेता हो तो वो 'आप' में आ सकता है / अभी अपने ईमानदार होने का सबूत देना बाकी है केजरीवाल को / मौका भी दिया मगर  कूटनीति खेलने लगे/ भाजपा हो या कांग्रेस हो , इनसे इतर वे कौनसा नया गेम खेल रहे हैं ? बताइये/ यही सब तो हमारी राजनीति में आज तक होता आया है/
अरविन्द केजरीवाल नामक इस शख्स को समझना होगा / समझ भी रहे हैं लोग / ये क्या वाकई में देश के लिए भला हो सकता है? चलिए मान लेते हैं कि वे भले हो सकते हैं/ किन्तु कैसे भले ? इस भले पन को दिखाओ तो पहले/ 'आप' हमेशा अपनी ही गोटी चलना चाहती है / आप की चित भी  और पट भी हो / आप ही गुरुर में रहो/ और देशभर की जनता आपको ही ईमानदार मानती रहे, बाकी सब आपके पीछे रहें  , आप ही इस देश के पहले और  ईमानदार नेता है / आखिर ऐसा कैसे हम सब मान लें? उसका कोइ एक तो उदाहरण सत्ता में रहकर दिखाते / क्यों बच्चो जैसी जिद है कि हमें बहुमत नहीं मिला , हम सरकार  नहीं बनाएंगे ? भाजपा तो राष्ट्रीय पार्टी है , वो राजनीति खेलती है/ उसका काम ही है कि वह हर कोण से सोचकर अपना फैसला ले/ उसके किसी भी तरह के कदम को आपकी तरह नहीं माना जा सकता / आप जो कहें वो वही करे , ऐसा नहीं हो सकता/ आप कांग्रेस से मिलिए न/ बिना शर्त जब वो आपको समर्थन दे रही है तो क्यों पीछे हटते  हो ? वे तो बस ८ विधायक है / आपके काम के बीच अडंगा भी नहीं डालेंगे/ दर असल भाजपा में नहीं 'आप' में भय है/ इसलिए पहली बार आपके साथ हुई जनता के फैसले को 'आप' नकार रहे  है/ और दोबारा चुनाव में दिल्ली को झौंक रहे हैं/ यह होती है राजनीति/ मिस्टर  ईमानदार की राजनीति/ शायद इसीलिये टीम अन्ना 'आप' को अब कोइ मौका देना नहीं चाहती कि 'आप' उनके दम पर चमकते रहे/ वैसे  भी दिखने लगा है बड़ा हुआ लालच और घमंड का 'ओरा'/

Tuesday, 10 December 2013

मिल गया कांग्रेस को पीम कैंडिडेट ?

 नंदन निलेकणी 
अमिताभ श्रीवास्तव

प्रधानमंत्री टाइप कौन नेता है जिसे कांग्रेस प्रोजेक्ट कर सकती है ? कोइ भी नहीं / जो दीखते हैं उनमें से कोइ एक भी दूध का धुला नहीं दिखता/ लिहाजा सोनिया गांधी दिखने वाले नेताओं में से किसीका नाम चुनने जैसी गलती तो नहीं कर सकती/ फिर कौन? 
राहुल गांधी ? नहीं / कम से कम इस चुनाव में तो नहीं/ माहौल खिलाफ है/ ऐसे में गांधी परिवार पर हार की कोइ आंच उनके कद के लिए भारी पड़  सकती है/ वैसे भी जितने आकलन हो रहे हैं उनमें कांग्रेस की सरकार बनती नहीं दिख रही/ ऐसे में ऐसे किसी नाम को सामने लाया जाए जिसके हारने से कोइ फर्क गांधी परिवार को न पड़े/ यह भी एक राजनीति है और ऐसी राजनीति गांधी परिवार बेहतर तरीके से खेलना जानता है/ उसके सामने इसके अलावा कोई विकल्प भी तो नहीं है/ आप अगर सोचें कि सोनियागाँधी कपिल सिब्बल, चिदंबरम जैसे नेताओं को पीएम पद की उम्मीदवार बना कर चुनाव लड़ना चाहेंगी? तो ऐसा नहीं हो सकता/ इन नेताओं की अपनी छवि लगभग खराब है और मोदी का मुकाबला करना इनके बूते की बात नहीं/ खुद सोनियाइस पद के लिए नामांकित नहीं हो सकती और न ही राहुल को फिलवक्त बने माहौल में बली का बकरा बना सकती हैं/ 
एक खबर के मुताबिक़ सोनिया ने एक ऐसे नेता की पहचान कर ली है जिसे मोदी के खिलाफ पीएम उम्मीदवार घोषित करने में कोई बुराई नहीं होगी/ नंदन निलेकणी / क्या आपने कभी इनका नाम सुना है? नहीं न/ यही वजह है कि कांग्रेस नंदन के नाम पर गम्भीरता से सोच सकती है/ हालांकि नंदन निलेकणी ने ऐसी किसी भी बात से साफ़ इंकार किया है किन्तु अपने चुनाव लड़ने की बात पर किसी प्रकार की ना नुकुर उनके मुंह से सुनने को नहीं मिलती/ यानी समझा सकता है कि सोनिया गांधी नंदन निलेकणी को सामने लेकर आ सकती है/ नंदन को सामने लाने के पीछे भी ठोस कारण है/ वे साफ़ छवि वाले इंसान है/ बिजनेस से सम्बंधित unkee पकड़ मजबूत है/ इनफ़ोसिस के संस्थापक के रूप में उन्हें देखा जाता है/ अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर भी उनकी छवि बेहतर है/ उम्र के लिहाज से भी वे बिलकुल फिट केंडिडेट माने जा सकते हैं/ नंदन आई आई टी से हैं और युवाओं के लिए सम्भव है वे नई किरण के रूप में निखर कर सामने आयें/ बेंगलूर से वे लोकसभा चुनाव लड़ने की तैयारी में जुटे  हैं/ मगर अभी खुद को प्रचारित करने के मूड में नहीं दीखते/  निलेकणी की एक विशेषता और है वे मधुर स्वभाव के और सबके साथ मिलनसार हो जाने वाले इंसान है/ मेहनती और कर्तव्य निष्ठ नंदन ही एकमात्र ऐसे व्यक्ति दिखाई देते हैं जिनके नाम पर अगर कांग्रेस राजी हो जाती है तो कोइ अप्रत्याक्षित फैसला नहीं माना जा सकता क्योंकि कांग्रेस को आज सबसे बड़ी जरुरत इसी बात की है कि उसे लोगों के सामने एक साफ़-सुथरी छवि वाला नेता लाना है/ सम्भव है नंदन ही हों कांग्रेस की ओर से पीएम  उम्मीदवार? 

कांग्रेस की उखड़ती साँसे

कांग्रेस क्या अपने पतन पर खड़ी है? चार राज्यों के चुनाव परिणामों और देश में बन रही उसकी छवि इस सवाल को गम्भीरता से प्रकट करती है / अगर एक नजर में इस सवाल के उत्तर में हम हां को जगह देकर देखें तो इसके कई कारण भी दृष्टिगोचर होने लगते हैं/ यह कारण कोई बचकाने नहीं है जिनसे बचा जाए बल्कि इतने ठोस हैं कि कांग्रेस को न केवल पुनरमंथन करना होगा बल्कि अपनी पार्टी में सफाई भी करनी होगी/
इंदिरा -राजीव काल के बाद सोनिया गांधी का सफ़र कुछ हद तक संतोषजनक रहा  किन्तु अब राहुल काल में सोनिया की छवि को यदि धक्का पहुंचा है तो इसका मूल कारण ये दोनों आला नेता ही हैं जिन्होंने चाटुकारिता को प्रमुखता दी और सलाहकारों को खुल्ला छोड़ दिया/ गांधी परिवार की यह विशेषता रही है कि उसने अपने आगे किसी नेता को खड़ा नहीं होने दिया / अभी भी इस परम्परा को उन्होंने बनाये रखा है किन्तु उनके नेताओं द्वारा उनको बेवकूफ बनाये रखने की 'चाल' को समझ पाना गांधी परिवार के बस में नहीं रह गया/ परिणाम सामने है कि कांग्रेस की हार का ठीकरा गांधी परिवार पर फूटता है और गांधी परिवार की छवि जनता के सामने कौड़ी भर की होने लगी है/ ये जो कांग्रेसी नेताओ का समर्पण है , ये दिल से नहीं दिमाग से है / उन्हें पता है कि उनकी रोजी रोटी सोनिया -राहुल से जुडी है / वे यह भी जानते हैं कि दोनों को किस तरह अँधेरे में रखा जा सकता है और कब तक रखा जा सकता है / ताकि उनकी झोली इतनी भर जाए कि भविष्य की चिंता न रहे/ यानी गांधी परिवार की भक्ति में लीन रहते हुए बेवकूफ बनाया जाता रहे/ दिग्विजय सिंह हों या कपिल सिब्बल, या फिर चिदंबरम, राजिव शुक्ला जैसे नेता हों, इन नेताओं ने कांग्रेस को अपनी गिरफ्त में इतना ले रखा है कि सोनिया-राहुल इनके इतर कुछ सोच ही नहीं पाते / शीला दीक्षित की हार और उसके बाद उनका एक कमेंट कि 'नेताओं की वजह से पराजय ' इस बात को पुख्ता करता है/ फिर भी स्थिति इतनी दृढ़ है कि सोनिया अगर अपनी पार्टी में सफाई भी करना चाहे तो नहीं कर सकती /
राहुल गांधी पूरी तरह से अपरिपक्व नेता हैं और यही वजह है कि उन्हें सिर्फ चाटुकारिता में घिरे रह कर ही काम करना है/ वे कितना भी खुद को प्रोजेक्ट करने की कोशिश करें, या  खुद में साहस, या आत्मविश्वास को दर्शाये किन्तु वे अपने इस घेरे को चाहते हुए भी नहीं तोड़ सकते/ कांग्रेस के खिलाफ बने वातावरण को आखिर कब तक धन बल , बाहुबल से सामान्य बनाये रखा जा सकता है ? मंहगाई है , गरीबी है, घोटाले हैं , यौनाचार के मामले हैं इन पर पर्दा डालना फिलवक्त सम्भव नहीं/ और ऊपर से कांग्रेस का कोइ नेता खुद को झुकाने को तैयार नहीं है जिससे जनता को उनके प्रति हमदर्दी हो सके/  उनके दम्भ और उनके अतिआत्मविश्वास को जनता समझने लगी है/ वो उनके घड़ियाली आंसुओं से भी परिचित हो चुकी है जो कांग्रेसी आये दिन बहाते नज़र आते हैं/ सबसे बड़ी एक वजह यह भी है कि कांग्रेस का प्रधानमंत्री लोकप्रिय नेता के रूप में खुद को अब तक खड़ा नहीं कर पाया है/ आप देखिये मनमोहन सिंह प्रचार के दौरान कितने निरीह जान पड़ते हैं/ ये लोग समझते हैं कि उनकी ज्यादातर अनुपस्थिति का कारण क्या है? उनमें वो ऊर्जा दिखाई ही नहीं देती जो आज की जरुरत है/ और लगभग सारे कांग्रेसी अभी भी इस समीकरण पर विश्वस्त हैं कि भारतीय जनता पार्टी आंकड़ों के लिहाज से सरकार नहीं बना पायेगी / न बना सके/ किन्तु इसमें कांग्रेस खुद को कितना मजबूत बना रही है, यह प्रश्न तो होगा ही/ मान लीजिये ले-दे कर गठबंधन की सरकार फिर बन जाए / मगर देश की जनता में कांग्रेस के लिए प्रेम तो नहीं ही उमड़ सकता/ यह सरकार विडम्बना के रूप में देश के सामने होगी , क्योंकि भाजपा की तुलना में कांग्रेस की लोकप्रियता कमतर ही रहने वाली होगी/
कांग्रेस यानी सोनिया गांधी / यह जो फार्मूला है उसे खुद सोनिया को तोड़ना होगा , सोनिया को अपने नेताओं को सिखाना होगा कि वे व्यक्ति पूजक न बने रहें बल्कि देश की जनता के पूजक हों/ किन्तु यह भी  उनकी फितरत से बाहर की बात है/ लिहाजा कांग्रेस के पतन की सुनिश्चितता इसी बात में निहित है/ तो देखना दिलचस्प होगा इस बड़ी पार्टी के भविष्य को / 

Monday, 9 December 2013

अब तो दिल्ली में 'जंग' का ही सहारा है

दिल्ली में चुनावी जंग के बाद जो रिजल्ट आया उसने दिल्ली की परेशानियां दुगनी कर   दी  है/ भारतीय़  जनता पार्टी और आम आदमी पार्टी के बीच रस्साकशी में आसार  यह नज़र आने लगे हैं कि दिल्ली में अब कोइ तख्तोताज धारण नहीं करेगा बल्कि यह 'जंग' के रास्ते
जायेगी / यानी इस साल बने नए उप राज्यपाल नजीब जंग दिल्ली को सम्भाल सकते हैं/ इसकी पूरी सम्भावनाएं हैं/
पूर्व आईएएस अधिकारी और जामिया मिलिया इस्लामिया के कुलपति रहे नजीब जंग इस साल जुलाई में ही दिल्ली के नए उप राज्यपाल बने थे  / वे मध्‍यप्रदेश कैडर के आईएएस अधिकारी रहे/  62 वर्षीय  जंग को तेजेंदर खन्ना के स्थान पर उप राज्यपाल बनाया गया था / बतौर नौकरशाह अपने कॅरियर में नजीब जंग कई अहम पदों पर रहे। इस जंग की विशेषता यह है कि ये असली ईमानदार आदमी है / कुलपति रहे तब केवल एक रुपया वेतन लिया यानी ४६ दिनों में ४६ रुपया इनकी वेतन आमदनी रही/ दिल्‍ली में जन्‍मे नजीब जंग ने दिल्‍ली यूनिवर्सिटी (डीयू) से ग्रेजुएशन किया था/ बाद में उच्‍च शिक्षा के लिए वो लंदन स्‍कूल ऑफ इकोनॉमिक्‍स भी गए/ जंग भारत में उच्‍च शिक्षा की हकीकत पड़ताल करने वाली समिति सहित सरकार के कई अहम पैनलों में भी रह चुके हैं/ फिलवक्त उप -राज्यपाल के तौर पर जंग दिल्ली पुलिस और दिल्ली विकास प्राधिकरण के प्रभारी हैं/ वह दिल्ली सरकार के प्रशासनिक प्रमुख भी हैं/ जंग ने उप राज्‍यपाल के पद की शपथ लेने के बाद कहा था कि कानून व्यवस्था में सुधार और महिलाओं की सुरक्षा सुनिश्चित करना उनकी प्राथमिकता होगी/ हालांकि उनके काल में ही दिल्ली ने महिलाओं की सुरक्षा सम्बंधित भूचाल झेला है/
बहरहाल, अब हालात ऐसे हैं कि दिल्‍ली की सरकार बनवाने में जंग की अहम् भूमिका होगी /
 वे बड़ी पार्टी होने के नाते  बीजेपी को सरकार बनाने का न्‍योता देंगे/ भाजपा यह पेशकश कबूल करती है तो उसे विधानसभा में बहुमत साबित करना होगा/ जैसी स्थिति है उस लिहाज से  बहुमत मिलना नहीं है /
यानी बीजेपी दिल्‍ली में सरकार बनाने से इनकार करेगी और नजीब जंग दूसरी सबसे बड़ी पार्टी 'आप' को सरकार बनाने का न्‍योता देंगे / 'आप' ने भी सरकार बनाने से इनकार कर दिया है , ऐसे हालात में जंग दिल्‍ली में राष्‍ट्रपति शासन की सिफारिश करेंगे/ यदि जंग ऐसा  करते हैं तो गृह मंत्रालय केंद्रीय कैबिनेट को इसकी जानकारी देगा और कैबिनेट को राष्‍ट्रपति शासन लगाने का फैसला सही लगता है तो वह अपनी सिफारिश राष्‍ट्रपति को भेज देगा/ ऐसा ही होना भी है/
अब देखिये दिल्ली की जंग का हाल -
सम्भावनाओं से कौन नकार सकता है / सम्भावनाएं रखनी भी चाहिए और दिल्ली को बचाने के लिए कुछ सुखद हो ऐसा काम भी होना चाहिए/
देखें क्या क्या सम्भव हो सकता है? 
या तो भाजपा के साथ मिलकर आप- सरकार बनाए/ यानी 60 विधायकों का समर्थन/ किरण बेदी का कहना है कॉमन मिनिमम प्रोग्राम (सीएमपी) बना कर छह माह तक सरकार चलाकर देखना चाहिए/ मगर 'आप' ने इस प्रस्ताव को खारिज कर दिया है/
अब बात आती है कि  अगर ;आप' के 28 के साथ कांग्रेस के आठ विधायक साथ आ जाएं तो 36 का आंकड़ा हासिल हो जाएगा/ जिसकी जरुरत है / पर ऐसा भी होना नहीं है/
तब फिर क्या होगा ? या तो 'आप' सदन से गैरहाजिर रहे/ सरकार भाजपा बनाए और विश्वास प्रस्ताव के समय 'आप' के विधायक सदन से गैरहाजिर हो जाएं/ ऐसे समय सदन में रहेंगे 42 विधायक/ और विश्वास मत के लिए चाहिए होंगे 22 विधायक/ भाजपा के पास यह संख्या है  /
यदि ऐसा भी अगर नहीं होता है तो भाजपा   सदन से गैरहाजिर  रहे/ सरकार आम आदमी  पार्टी बनाए/ विश्वास प्रस्ताव के दौरान भाजपा सदन से गैरहाजिर रहती है तो सदन में बचेंगे 38 विधायक/ ऐसे में बहुमत के लिए 20 विधायकों की जरूरत होगी जो 'आप' के पास है ही/
अब इतना भी कुछ नहीं होता है    तो दिल्ली 'जंग' के हवाले कर दी जायेगी और छ महीनों में फिर से चुनाव होंगे / 

'आप' की देखिये राजनीति

यह दिल्लीवालों की मूर्खता ही है / हाँ, अपने पैरों पर कुल्हाड़ी चलाने वाला मूर्ख ही कहलाता है/ भले दिल्ली वाले यह न मानें, वैसे भी कौन मूर्ख खुद को मूर्ख कहता है / बहरहाल, यह मूर्खता नहीं तो क्या कि आपने अपनी दिल्ली में किसी को बहुमत नहीं दिया/ बहुमत न मिलना किसी पार्टी विशेष के लिए उतने घाटे का सौदा नहीं है जितना दिल्ली वालों के लिए है/ क्या आप जानते हैं दोबारा चुनाव होने की स्थिति में आपकी जेब पर इसका कितना असर होता है? आपके कामकाज पर कितना बुरा प्रभाव पड़ता है? यह सब आप दिल्ली वाले भले न जानें पार्टियां जानती हैं/ आप अब ये विचार करें कि जो फैसला आपने दिया है उस फैसले को आपकी जीती हुई पार्टी ही नहीं मान रही/ उनका दम्भ देखिये कि वे दोबारा चुनाव करा सकती हैं, अपनी जनता की फ़िक्र उन्हें  नहीं है/ 'आप' वाले बड़ी शान से इसे जनता का चुनाव कह रहे थे/ जनता जीती है भई, अब क्यों पीछे हट रहे हो? भाजपा और आप , इन दो पार्टियों को जनता ने समर्थन दिया / इन दोनों का फर्ज बनता है कि आपसी दम्भ छोड़कर सरकार बनाएँ और दिल्ली को बचाएं/ मगर अरविन्द केजरीवाल साहब को यह पसंद नहीं / उनका कहना है हमें बहुमत नहीं दिया/ कितना अहंकार है इस आदमी में, कितनीबड़ी राजनीति खेलने का विचार इस आदमी के दिमाग में है क्या आप जानते है? नहीं जानते/ होना तो यह चाहिए कि अरविन्द को अपनी जनता के लिए भाजपा का समर्थन करते हुए विपक्ष में बैठना चाहिए/  और दिल्ली के लिए बेहतर काम करने की नीति पर चलना चाहिए/ मगर उन्हें लोगों से क्या मतलब / उन्हें तो आप पहले बहुमत दीजिये फिर सत्ता पर बैठाइये/
सिर्फ और सिर्फ अरविन्द केजरीवाल की वजह से दिल्ली को दोबारा चुनाव देखने पड़ सकते हैं/ और अगर ऐसा है तो केजरीवाल की ही वजह रहेगी कि वे  प्रशासन, बजट और खर्च की पेचीदगियां ला खड़ा करेंगे/  सबसे बड़ी दिक्कत आम कामकाज से लेकर ट्रेड, इंडस्ट्री, फाइनेंस, हाउसिंग, पीडब्ल्यूडी के कई लंबित प्रोजेक्ट्स के लिए होगी , जिसका खामियाजा आम जनता को भुगतना है/ ऐसे में अब आप समझिये कि आपने 'आप' को मत देकर कितना बड़ा नुक्सान किया है / अगर आपको 'आप' को ही जिताना था तो बहुमत देते / या फिर भाजपा को ही सरकार बना लेने की स्थिति दे देते / भाजपा तो सरकार बनाना चाहती है / उसे दिल्ली की फ़िक्र है किन्तु केजरीवाल को फिक्र नहीं / शायद सम्भव है दोबारा चुनाव में जनता इस सच्चाई को समझ सके/